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मौन मन की चाल संग

  मौन …….! मन भटकता है … वाचाल है… समय भी तो मौन है ! देखो चल रहा है  उसकी अपनी मौलिक गति और चाल है… प्रश्न तुम्हारे हैं   जगत के भी ढेर सारे हैं... क्या उत्तर?  ,किस- किस को उत्तर ? भीड़ है और भीड़ से अलग हो तुम ! दीर्घ-धावक अश्व तुम ! मौन होकर बढ़े चलो ! समय की चाल से सटे हुए  अंधेरे में  टिमटिमाती   एक किरण के बल से अपना मनोबल बढ़ाते चलो तुम ! बढ़े चलो तुम ! बढ़े चलो तुम ! © मुकेश कुमार बड़गैयां कृष्णधर दि्वेदी पथरिया- जिला- दमोह मध्यप्रदेश